Wed. Jun 10th, 2026

यह एक मौलिक और समाचार शैली में तैयार की गई खबर है:

📰 माता-पिता की सेवा को मिला कानूनी सहारा: सरकारी कर्मचारियों को 45 दिन की सवेतन ‘पेरेंट केयर लीव’ का प्रस्ताव

नई दिल्ली। देश में बढ़ती बुजुर्ग आबादी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए राज्यसभा में “पवित्र बंधन (माता-पिता देखभाल अवकाश) विधेयक, 2026″ पेश किया गया है। विधेयक को मंजूरी मिलने के बाद सरकारी और निजी क्षेत्र के लाखों कर्मचारियों को अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल के लिए पूरे सेवाकाल में 45 दिन का विशेष सवेतन अवकाश मिलने का रास्ता साफ हो गया है।

विधेयक का उद्देश्य कर्मचारियों को अपने वृद्ध माता-पिता के स्वास्थ्य, चिकित्सा और देखभाल के लिए आर्थिक नुकसान उठाए बिना समय उपलब्ध कराना है। प्रस्ताव के अनुसार यह अवकाश कर्मचारी की अन्य अर्जित छुट्टियों से अलग होगा तथा इसके लिए पूर्ण वेतन देय होगा।

विधेयक में माता-पिता की परिभाषा का दायरा बढ़ाते हुए जैविक, दत्तक एवं सौतेले माता-पिता के साथ-साथ 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के सास-ससुर को भी शामिल किया गया है। यह प्रावधान केंद्र और राज्य सरकारों के विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों तथा 10 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले निजी संस्थानों पर लागू होगा।

अवकाश लेने के लिए मेडिकल प्रमाण-पत्र अथवा अस्पताल से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे। हालांकि आपात स्थिति में कर्मचारी बिना पूर्व अनुमति के भी अवकाश ले सकेगा, लेकिन उसे सात कार्य दिवस के भीतर आवश्यक दस्तावेज जमा कराने होंगे।

विधेयक में कर्मचारियों के हितों की सुरक्षा का भी विशेष प्रावधान किया गया है। पेरेंट केयर लीव का लाभ लेने वाले कर्मचारियों के साथ प्रमोशन, वेतनवृद्धि या स्थानांतरण के मामलों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जा सकेगा। वहीं बिना उचित कारण अवकाश से इनकार करने वाले नियोक्ताओं पर 50 हजार से 2 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा।

फर्जी मेडिकल दस्तावेजों के आधार पर अवकाश लेने की स्थिति में संबंधित कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी और उसे अवकाश अवधि के दौरान प्राप्त वेतन वापस करना पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि 35 से 55 वर्ष आयु वर्ग की तथाकथित ‘सैंडविच जनरेशन’, जो एक साथ बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारी निभा रही है, को इस कानून से बड़ी राहत मिलेगी। साथ ही भारतीय संस्कृति के “मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः” जैसे मूल्यों को भी व्यावहारिक समर्थन मिलेगा।

यदि यह व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू होती है तो कर्मचारियों को अपने माता-पिता की बीमारी और देखभाल के समय नौकरी, वेतन और पारिवारिक दायित्वों के बीच कठिन चुनाव नहीं करना पड़ेगा। यह पहल कार्यस्थल को अधिक संवेदनशील और परिवार-केंद्रित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

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