जयपुर।
राजस्थान शिक्षा विभाग द्वारा शैक्षणिक सत्र 2025-26 से पहले ही सभी कक्षाओं की वार्षिक परीक्षाएं लगभग एक माह पूर्व आयोजित किए जाने के निर्णय ने शिक्षा जगत में हलचल पैदा कर दी है। सरकार की मंशा 1 अप्रैल से नया शैक्षणिक सत्र शुरू करने की है, लेकिन यह फैसला समय पर न लिए जाने के कारण अब इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं।
अचानक बदले गए परीक्षा कैलेंडर से विद्यार्थियों, अध्यापकों और अभिभावकों—तीनों पर जबरदस्त मानसिक दबाव बन गया है।
विद्यार्थियों पर बढ़ा शैक्षणिक तनाव
समय से पहले परीक्षाएं होने से विद्यार्थियों को पूरा पाठ्यक्रम समझने और दोहराने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाया। खासकर प्राथमिक व माध्यमिक स्तर के बच्चों पर इसका सीधा असर पड़ा है। कई विद्यार्थियों ने स्वीकार किया कि पाठ्यक्रम अधूरा होने के कारण वे परीक्षा को लेकर असमंजस और तनाव में हैं।
अध्यापकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती
शिक्षकों का कहना है कि पाठ्यक्रम पूरा करवाना अब एक बड़ी चुनौती बन गया है।
अध्यापक संगठनों का तर्क है कि यदि सरकार को 1 अप्रैल से नया सत्र शुरू करना था तो इसकी घोषणा कम से कम 6–8 माह पहले होनी चाहिए थी।
शिक्षकों का कहना है कि—
सीमित समय में पाठ्यक्रम पूर्ण कराना
गुणवत्तापूर्ण शिक्षण बनाए रखना
और साथ ही परीक्षा परिणामों की जिम्मेदारी निभाना
तीनों कार्य एक साथ करना बेहद कठिन हो गया है।
अभिभावकों की चिंता: बच्चों की सेहत और भविष्य
अभिभावकों का कहना है कि जल्दबाज़ी में लिए गए इस फैसले से बच्चों की मानसिक सेहत प्रभावित हो रही है।
कई अभिभावकों ने चिंता जताई कि—
बच्चों पर परीक्षा का अनावश्यक दबाव बढ़ गया है
ट्यूशन और अतिरिक्त पढ़ाई का बोझ भी बढ़ा है
सीखने की बजाय केवल नंबर आधारित तैयारी पर ज़ोर हो गया है
अभिभावक संगठनों ने सरकार से निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग की है।
सरकार का पक्ष: शैक्षणिक सुधार की दिशा में कदम
वहीं शिक्षा विभाग का कहना है कि 1 अप्रैल से नया सत्र शुरू करना राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के अनुरूप है। इससे—
पढ़ाई का समय बढ़ेगा
परीक्षा परिणाम और प्रवेश प्रक्रियाएं समय पर पूरी होंगी
विद्यार्थियों को वार्षिक अवकाश के बाद नई शुरुआत का अवसर मिलेगा
सरकार का दावा है कि यह व्यवस्था दीर्घकालीन रूप से विद्यार्थियों के हित में साबित होगी।
सवाल यह है…
विशेषज्ञों का मानना है कि सुधार जरूरी हैं, लेकिन बिना पर्याप्त तैयारी और संवाद के लिए गए निर्णय शिक्षा व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार अल्पकालिक दबावों को कम करने के लिए कोई राहत पैकेज या लचीली व्यवस्था लागू करेगी?
फिलहाल, शिक्षा जगत इस निर्णय के असर का सामना कर रहा है और सभी की निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।
