Sun. Jun 16th, 2024
मनोज व्यास, संपादक

हमारे देश में निःशुल्क योजना घोषणाओं की परंपरा बन चुकी है । किसी भी राष्ट्र के लिए लोक कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन अति आवश्यक है। लेकिन पिछले एक दशक की योजनाओं का आंकलन करें तो सैकड़ों निःशुल्क योजनाएं लोगों को निःशुल्क सुविधाएं प्रदान करने की प्राप्त होगी । इन योजनाओं में केवल व्यय पर फोकस किया जाता है। उस योजना पर  खर्च होने वाली राशि का पुनर्भरण कहांँ से होगा । इस पर विचार करने की आवश्यकता भी होती है । उससे होने वाले राजस्व  पर कोई आधारभूत जिम्मेदारी तय नहीं की जाती।  राजनीतिक दलों ने भी लोगों से वोट बटोरने के लिए ऐसी योजनाओं को अपना एक सशक्त हथियार बना लिया है । निशुल्क घोषणाओं को अपने मेनिफेस्टो में शामिल करते आए हैं । पिछले लोकसभा एवं विधानसभा  चुनावों का आंकलन किया जाए तो सभी राजनीतिक दलों ने अपने मेनिफेस्टो में लोगों को अनेक स्तर पर निशुल्क सुविधाएं देने की घोषणाएं की। लेकिन उनके इन योजनाओं मैं लोगों का सरकार के प्रति क्या उत्तरदायित्व या जिम्मेदारी रहेगी इसका कहीं पर भी आधारभूत विवरण नहीं दिखाई देता है। जैसे निशुल्क बिजली ,निशुल्क खाद्य सामग्री ,निशुल्क मेडिसिन ,निशुल्क कपड़े ,निशुल्क शिक्षा  जैसी योजनाएं हैं जिन पर केंद्र एवं राज्य सरकार के खजाने को बहुत बड़ी राशि का भार  झेलना पड़ता है। निशुल्क योजनाओं से लाभान्वित लोगों से बात की जाए तो वह इसे अपना मौलिक अधिकार तो मानते हैं लेकिन संविधान में उनके प्रति जो जिम्मेदारियां देश के प्रति तय की गई है उनको वह निभाने में असफल प्रतीत होते जा रहे हैं । देश के अर्थशास्त्र से जुड़े लोग भारत में बढ़ रही यह निशुल्क परंपरा से चिंतित हैं उनका मानना है कि निराश्रित और अति आवश्यकता वाले व्यक्तियों को तथा विशेष परिस्थितियों जैसे बाढ़ ,भूकंप, महामारी आदि के समय सरकार द्वारा उपलब्ध करवाई गई निशुल्क व्यवस्थाएं लाजमी है । लेकिन सामान्य जीवन में इस तरह की निशुल्क सुविधाएं उपलब्ध करवाने से लोगों में बेकार बैठने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है । उनका मानना है कि इन निशुल्क योजनाओं के बजट को यदि रोजगार सर्जन में परिवर्तित किया जाए तो ज्यादा बेहतर होगा और लोगों को निशुल्क सुविधाएं न देने से लोगों में अपने खर्चों को चुकाने के लिए जिम्मेदारी तय की जाए तो उनमें काम करने की आदत भी बढ़ेगी। हाल ही में आम बजट के दौरान प्रस्तुत आर्थिक सर्वे में भारत की आर्थिक ग्रोथ 8 से 8.30 प्रतिशत बढ़ने की आशंका लगाई गई है यदि उपरोक्त निशुल्क योजनाओं को  बंद कर रोजगार सृजन में इस राशि को खर्च किया जाए तो इस ग्रोथ में निश्चित रूप से इजाफा हो सकता है।

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